‘सिर्फ पोस्ट डालने वाला जिम्मेदार क्यों, प्लेटफॉर्म्स पर भी हो एक्शन’
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पर झूठी सूचनाओं के प्रसार से होने वाली हिंसा पर चिंता जताई है, खासकर एलपीयू घटना के संदर्भ में।

Delhi Desk; चंडीगढ़। इंटरनेट मीडिया पर किसी ऐसी घटना की झूठी सूचना प्रसारित करना, जो वास्तव में हुई ही नहीं, गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकता है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी सूचना से अचानक हिंसा भड़क सकती है और जान-माल तथा संपत्ति का नुकसान हो सकता है।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि किसी इंटरनेट मीडिया पोस्ट के कारण हिंसा और जान-माल का नुकसान होता है तो केवल पोस्ट डालने वाले व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त होगा या फिर संबंधित इंटरनेट मीडिया मंच की भी जवाबदेही तय करने के लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए।
एलपीयू हिंसा पर क्या बोले चीफ जस्टिस?
चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने पंजाब सरकार की ओर से लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) में झूठी सूचना के प्रसार से हुए हंगामे की जानकारी दिए जाने के बाद ये टिप्पणियां कीं।
कोर्ट ने कहा कि मामला केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जिसने इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट अपलोड की थी। खासकर तब, जब घटना हुई ही नहीं हो और उसके बारे में फैलाई गई सूचना से अचानक बड़े स्तर पर अशांति पैदा हो जाए।
अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी, लेकिन जानबूझकर झूठ फैलाना अलग मामला: हाई कोर्ट
चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरी मजबूती से संरक्षण किया जाता है। लोगों को अपनी राय रखने और आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन जानबूझकर ऐसी झूठी सूचना प्रसारित करना, जिसका उद्देश्य लोगों की भावनाएं भड़काना हो, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समान नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि एलपीयू और चितकारा में लगातार दो दिन हुई घटनाओं को भी अलग-अलग नजरिये से देखना होगा। चितकारा में 25 सितंबर को छात्राओं की आत्महत्या की घटना के बाद माहौल तनावपूर्ण हुआ था।
इसके अगले दिन एलपीयू में एक पुरुष कर्मचारी द्वारा छात्रा से दुष्कर्म किए जाने की झूठी सूचना इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित की गई। याचिकाकर्ता की ओर से दोनों घटनाओं के बीच संबंध होने का दावा किया।
सीमा राज्य होने के कारण मामला और गंभीर
हाई कोर्ट ने कहा कि पंजाब सीमावर्ती राज्य है, इसलिए झूठे प्रचार के जरिए बड़े स्तर पर अशांति पैदा करने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि हजारों विद्यार्थियों के बीच ऐसी सूचना पहुंचती है कि कोई गंभीर घटना हुई है, तो वे अचानक सड़कों पर उतर सकते हैं और स्थिति हिंसक हो सकती है। एलपीयू में करीब 28 हजार विद्यार्थी हैं और ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय कई दिनों तक बंद हो सकता है।
खंडपीठ ने राज्य को यह भी पता लगाने के निर्देश दिए कि क्या दोनों घटनाओं में एक ही इंटरनेट मीडिया मंच का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच केवल पोस्ट डालने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उसके पीछे कौन था और सूचना कहां से आई।




